"प्रभु, ये कैसा दिया जीवन का वनवास!!"
जीवन अधमरा सा दिया,
सपने दिए विशाल,
भोगा नही सुख कोई,
दुःख बन गए विकराल।
चक्षु दो कमजोर दिए,
सपने दिए अपार,
सुन्दर कुछ देख पाने से पहले ,
कर डाला मेरी रौशनी से व्यापार।
मुसीबतों का युद्ध दिया,
ना दी कोई ढाल,
अंधियारे के प्रहार किए ,
और दी ना कोई मशाल।
संतो से उत्तर दिए,
पर दिए ना उन जैसे सवाल,
जब मौन चाहा,
तब हाँ, तुमने दे डाले, अजीब से बवाल।
समुद्र सा हृदय दिया,
और बिछा डाले जाल,
अब तम का बनाओ सागर,
और भेजो मेरा काल।
- नेहा शर्मा
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